दादा जी मुझे बचपन में सबर जनजाति के लोगों के नारकीय जीवन के बारे में बताते थे। वह बताते थे कि किस तरह अनेक बुनियादी सहूलियतों के अभाव में वे लोग मजबूरन आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो जाते हैं।
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